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अरविन्द का मिशन मोदी या मिशन कांग्रेस
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Indian Election - Modi-Kejriwal-Rahul

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भारत के लोकसभा चुनावों में जहा हर पार्टी अपना अपना भाग्य आजमा रही हैं वही आम आदमी पार्टी ने भी दिल्ली को छोड़ समूचे देश में अपनी पहचान बनाने की कोशिश की है | दरअसल जब देश भ्रष्टाचार और महंगाई से परेशान था और कांग्रेस भाजपा का विकल्प ढूंढ रहा था तब अरविन्द केजरीवाल ने भ्रस्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले अन्ना का साथ छोड़ आम आदमी पार्टी का गठन किया था | उस वक्त लोगों ने आम आदमी पार्टी को कांग्रेस और भाजपा के विकल्प के रूप में देखा | आम आदमी पार्टी ने महज कुछ ही दिनों में दिल्ली कि जनता का साथ हासिल किया और पहली ही बार में जनता ने इसे २८ सीटों से नवाज दिया | जनता के साथ और विश्वास का सम्मान रखते हुए केजरीवाल ने आखिर अपना वादा तोड़ते हुए अपनी ही मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के साथ सरकार बना डाली |

केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने से दिल्ली कि जनता को आस बड़ी कि अब दिल्ली में तो शायद सरकार जनता के साथ जनता के लिए ही काम करेगी लेकिन हुआ विल्कुल उलटा और केजरीवाल सरकार लगातार उलझनों में फँस कर केवल बयान बाज़ी में ही उतर गयी और बामुश्किल महज़ 2 महीनो के लिए ही जनता को पानी बिजली के दामों में कमी का सपना दिखा पायी | किसी भी निति, विचारधारा और उद्देश्यों के बिना जनता के बीच उतरने वाली आम आदमी पार्टी ने इस दौरान अपना खाता भरने और लोकसभा चुनावों की तैयारी में सदस्यों की संख्या बढ़ाने के सिवाय कुछ और किया ही नहीं तथा जनसमर्थन के मुद्दों को भूलकर पूंजीपति व्यवस्था का अंग बन गयी | इसी भूलभुलैया में घूमते हुए दिल्ली में केजरीवाल ने मात्र ४९ दिनों के बाद ही अपना त्याग पत्र दे दिया | इस बार त्यागपत्र देते हुए केजरीवाल ने बिना जनता का सहारा लिए ही निर्णय लिया और प्रधानमंत्री की कुर्सी दौड़ में शामिल होने के लिए निकल पड़े |

केजरीवाल के इस निर्णय से जनता को जहाँ गहरा आघात पहुंचा वही विरोधियों के स्वर भी बुलंद हो गए और लोगों ने केजरीवाल को कोंग्रेस के मोहरे की शक्ल दे दी | दूसरी और केजरीवाल ने भी जनता के विश्वास को कायम रखते हुए कांग्रेस को पतन का मुह दिखा सकने वाली पार्टी भाजपा के खिलाफ अपना मोर्चा खोल दिया | केजरीवाल ने अपनी रणनीति के तहत मोदी को हारने और फिर कोंगेस के साथ मिलकर केंद्र में सरकार बनाने का सपना देखा और कूद पड़े बनारस जैसे शहर से मोदी के खिलाफ चुनाव में | चाहे बनारस कि गलियों से हम वाकिफ भी ना हो परेशानियों से अवगत ना हो परन्तु मोदी को हराकर भाजपा को सरकार बनाने से रोकना ही हमारा मकसद है | इसी मकसद के साथ केजरीवाल ने कांग्रेस के दिग्गजों और पूंजीपतियों को टिकट से नवाज कर चुनावी मैदान में भाजपा के खिलाफ खड़ा कर दिया और खुद भी खुल्लमखुल्ला मोदी के सामने ही टिके हुए हैं | हांलांकि केजरीवाल के आ जाने से चुनावी मुकाबला जरूर कडा बन चुका है लेकिन अब आरोपों से आम आदमी ही आम आदमी पार्टी से दूर होता दिखाई दे रहा है |

आम जनता के दिलो में परिवर्तन कि इच्छा है लेकिन विकल्पों का अभाव और पूंजीवादी व्यवस्थित राजनीति का प्रभाव आज इतना हावी हो गया है कि मतदाता के सामने निर्णय करना आसान नहीं रह गया है | एक ओर देश पर शासन करने वाली कांग्रेस तथा उसके सहयोगी दल हैं तथा दूसरी ओर भाजपा है | इन दोनों विपक्षियो के बीच पहुँचने की कोशिश में है आम आदमी पार्टी | पार्टी ने अपनी इसी कोशिश में समूचे भारत में मोदी ओर राहुल विरोधी स्वर अपनाते हुए अपने प्रत्याशी मैदाने जंग में उतार डाले है | उन्हें अपेछा है कि इस कोशिश के परिणाम स्वरुप भारत की जनता असमंजस में फँस कर संसद में स्पष्ट बहुमत से किसी भी पार्टी को चुन कर ना भेजे और भारत में दिल्ली की भाँती ही राष्ट्रपति शासन जैसा कोई कदम उठाया जा सके या एक बार फिर से कांग्रेस अपनी सरकार बनाने में सफल हो सके जिसमे आम आदमी का समर्थन और भूमिका हो | देश में खुले आम हो रहे इस छलावे से अभी तक भारत की जनता अनजान है और नहीं जानती कि चोर अपने गुनाह छिपाने के लिए एक साहूकार को जरूर सामने लाता है ताकि सिक्के के दोनों हिस्सों पर सिर्फ उसका ही अधिकार हो | अब देखना यह है कि भारत की जनता अपने मताधिकार का प्रयोग विवेक से करती है अथवा एक बार फिर से त्रिशंकू संसद का निर्माण किया जाता है ताकि देश को भयानक समस्याओं का सामना करना पड़े और अस्थिर सरकार या तो दबाब में देश की अस्मत विदेशों के हाथों बेचती रहे या कुछ ही दिनों में गिराकर राष्ट्रपति शासन की नीव राखी जाये |
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